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तुमको इससे क्या… November 15, 2006

Posted by Jaydeep in परवीन शाकिर.
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टूटी है मेरी नींद, मगर तुमको इससे क्या,
बजते रहे हवाओसे दर, तुमको इससे क्या.

तुम मौज मौज मिस्ले-सबा घूमते रहो,
कट जाये मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या.

औरो का हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ,
मैं भूल जाउं अपना ही घर, तुमको इससे क्या.

अब्रे-गुरेज़-पा को बरसने से क्या गरज़,
सीपीमें बन न पाये गुहर, तुमको इससे क्या.

ले जाये मुझको माले-ग़नीमत के साथ उदू,
तुमने तो डाल दी है सिपर, तुमको इससे क्या.

तुमने तो थक के दश्तमें खेमे लगा लिए,
तन्हां कटे किसीका सफर, तुमको इससे क्या.
-परवीन शाकिर
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मिस्ले-सबा: હવાની લહેરખીઓ
अब्रे-गुरेज़-पा:વરસાદી વાદળાઓ
सीपी:છીપ
गुहर:મોતી
उदू: હરીફ, દુશ્મન
सिपर: ઢાલ

Comments»

1. વિવેક - November 21, 2006

तन्हां कटे किसीका सफर, तुमको इससे क्या…

- સરસ ગઝલ અને સરસ અંદાઝ-એ-બયાં…