हसीना-ए-खयाल से March 11, 2007
Posted by Jaydeep in फैज़ अहमद फैज़.trackback
मुझे दे दे
रसीले होंट, मासूमाना पेशानी, हसीन आंखे
के मैं एक बार फिर रंगीनीओमें खो जाउं
मेरी हस्ती को तेरी इक नज़र आग़ोशमें ले ले
हमेशा के लिए इस दाममें महफ़ूज़ हो जाउं
ज़िया-ए-हुश्न से ज़ुल्मत-ए-दुनियामें ना फिर आउं
गुज़िस्ता हसरतों के दाग़ मेरे दिल से धूल जाएं
मैं आनेवाले ग़म की फिक्र से आज़ाद हो जाउं
मेरे माज़ी ओ मुस्तक़बिल सरासर मह्व हो जाएं
मुज़े वो एक नज़र, एक जावेदानी सी नज़र दे दे
-फैज़ अहमद फैज़
* * * *
पेशानी: લલાટ,महफ़ूज़:સુરક્ષિત, गुज़िस्ता: વીતેલા,
माज़ी: ભૂતકાળ, मुस्तक़बिल: ભવિષ્ય,
मह्व: વિસ્મૃત, जावेदानी: શાશ્વત
वाह जनाब ।