मधुशाला:1-4 March 14, 2007
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मृदु भावों के अंगूरों की
आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से
आज पिलाऊंगा प्याला;
पहले भोग लगा लूं तुझको
फिर प्रसाद जग पाएगा;
सबसे पहले तेरा स्वागत
करती मेरी मधुशाला । 1 ।
प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर
पूर्ण निकालूंगा हाला,
एक पांव से साक़ी बनकर
नाचूंगा लेकर प्याला;
जीवन की मधुता तो तेरे
ऊपर कब का वार चुका
आज निछावर कर दूंगा मैं
तुझ पर जग की मधुशाला । 2 ।
प्रियतम, तू मेरी हाला है,
मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू
बनता है पीनेवाला;
मैं तुझको छक छलका करता,
मस्त मुझे पी तू होता;
एक दूसरे को हम दोनों
आज परस्पर मधुशाला । 3 ।
भावुकता अंगूर लता से
खींच कल्पना की हाला,
कवि साक़ी बनकर आया है
भरकर कविता का प्याला;
कभी न कण भर खाली होगा,
लाख पिएं, दो लाख पिएं !
पाठक गण हैं पीनेवाले,
पुस्तक मेरी मधुशाला । 4 ।
-हरिवंशराय बच्चन
મધુશાલા માંથી મધુ આપતા રહેશો.