‘मीर’ तक़ी मीर March 30, 2007
Posted by Jaydeep in 'मीर' तक़ी मीर, बज़्मे उर्दू.trackback
अश्क आंखों में कब नहीं आता
लहू आता है जब नहीं आता
होश जाता नहीं रहा लेकिन
जब वो आता है तब नहीं आता
दिल से रुख़सत हूई कोई ख़्वाहिश
गिर्यां कुछ बेसबब नहीं आता
इश्क़ को हौसला है शर्त वरना
बात का किस को ढब नहीं आता
जी में क्या क्या है अपने ऐ हमदम
हर सुखन ता-ब-लब नहीं आता
-‘मीर’ तक़ी मीर
गिर्यां : રુદન, सुखन : વાત, ता-ब-लब : હોંઠ સુધી
क्या बात है ।