कुछ रात कटे December 12, 2007
Posted by Jaydeep in फिराक़ गोरखपुरी.trackback
सागर-ए-सुबह चूकां लाओ, के कुछ रात कटे,
नूर-ए-सय्याल को छलकाओ, के कुछ रात कटे ।
नग़मा-ए-जल्वा-ए-रुख गाओ, के कुछ रात कटे,
शोला-ए-इश्क़ को भडकाओ, के कुछ रात कटे ।
भूले बिसरे हुए ग़म हाए हयात-ए-रफ़्ता,
तुम भी ऐसे में चले आओ, के कुछ रात कटे ।
एक मुद्दत से फज़ाओ में है शोले लपके,
साज़-ए-शबनम ही को खनकाओ, के कुछ रात कटे ।
ओढनी उसकी हवाएं है के तारों भरी रात,
किसी घूंघट ही को सरकाओ, के कुछ रात कटे ।
तुम जुदा होगे तो हो जाएगी यह रात पहाड,
रात की रात ठहर जाओ, के कुछ रात कटे ।
इस ज़माने में कहां है कोई रूदादे-निशात,
ग़म के अफ़साने कहे जाओ, के कुछ रात कटे ।
याद-ए-अय्यम की पूरवाईओ, धीमे धीमे,
मीर की कोई ग़ज़ल गाओ, के कुछ रात कटे ।
आ के महफ़िल में फ़िराक़, आज नहीं नग़मा सारा,
जा के उस को बुला लाओ, के कुछ रात कटे ।
–फ़िराक़ गोरखपुरी
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