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Archive for February, 2008

ये कह दो हज़रते-नासेह से गर समझाने आये है,
कि हम दैर-ओ-हरम होते हुए मयख़ाने आये है ।
- वहशत गौंडवी
निकल कर दैर-ओ-काबा से अगर मिलता न मयख़ाना,
तो ठुकराये हुए इन्सां, ख़ुदा जाने कहां जाते ।
- क़तील शिफ़ाई
हुदूदे-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा,
न कोई ग़ैर, न कोई रक़ीब लगता है ।
( हुदूदे-ज़ात=વ્યક્તિગત સીમાઓ )
तोड डाली मैंने [...]

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