अहमद फ़राज़
April 4, 2008 by Jaydeep
तेरे क़रीब आके बडी उलझनों में हूं
मैं दुश्मनों में हूं कि तेरे दोस्तों में हूं ।
मुझसे गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल
मैं संगे-राह हूं तो सभी रास्तों में हूं ।
तू आ चुका है सतह पे कब से ख़बर नहीं
बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूं ।
ऐ यारे ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं
कब से उदासियों के घने जंगलों में हूं ।
तू लूटकर भी अहले-तमन्ना को ख़ुश नहीं
मैं लुट के भी वफ़ा के उन्हीं क़ाफ़िलों में हूं ।
बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ्तगू
मैं जा चुका हूं हिर भी तेरी महफ़िलों में हूं ।
तू हंस रहा है मुझ पे मेरा हाल देखकर
और फिर भी मैं शरीक तेरे क़हक़हो में हूं ।
ख़ुद ही मिसाले-लाला-ए-सेहरा लहू-लहू
और ख़ुद ‘फ़राज़’ अपने तमाशाएयों में हूं ।
- अहमद फ़राज़
गुरेज़-पा = સંભાળીને ચાલનાર
संगे-राह = રસ્તાનો પથ્થર
यारे ख़ुश-दयार = સારો મિત્ર
मौज़ू-ए-गुफ्तगू = વાતનો વિષય
मिसाले-लाला-ए-सेहरा = જંગલના લાલ ફૂલની જેમ
વાહ
मुझसे गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल
मैं संगे-राह हूं तो सभी रास्तों में हूं ।
तू हंस रहा है मुझ पे मेरा हाल देखकर
और फिर भी मैं शरीक तेरे क़हक़हो में हूं ।
શુભાન અલ્લાહ