Posted in बज़्मे उर्दू on April 4, 2008 | 1 Comment »
तेरे क़रीब आके बडी उलझनों में हूं
मैं दुश्मनों में हूं कि तेरे दोस्तों में हूं ।
मुझसे गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल
मैं संगे-राह हूं तो सभी रास्तों में हूं ।
तू आ चुका है सतह पे कब से ख़बर नहीं
बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूं ।
ऐ यारे ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं
कब से उदासियों [...]
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Posted in फिराक़ गोरखपुरी on December 12, 2007 | No Comments »
सागर-ए-सुबह चूकां लाओ, के कुछ रात कटे,
नूर-ए-सय्याल को छलकाओ, के कुछ रात कटे ।
नग़मा-ए-जल्वा-ए-रुख गाओ, के कुछ रात कटे,
शोला-ए-इश्क़ को भडकाओ, के कुछ रात कटे ।
भूले बिसरे हुए ग़म हाए हयात-ए-रफ़्ता,
तुम भी ऐसे में चले आओ, के कुछ रात कटे ।
एक मुद्दत से फज़ाओ में है शोले लपके,
साज़-ए-शबनम ही को खनकाओ, के कुछ रात कटे [...]
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Posted in बज़्मे उर्दू on November 30, 2007 | 1 Comment »
મિત્રો,
રાજકોટ આવીને ફરી પાછાં આપની સાથે કદમ મેળવતાં થોડો વિલંબ જરૂર થયો છે, પરંતુ હવે નિયમિતતા આવશે એવી અપેક્ષા છે. કશ્મીર છોડીને મારી હાલત બયાન કરવા માટે પ્રસ્તુત છે ફિરાક ગોરખપુરી સાહેબની એક ગઝલ:
गुज़रे हुए ज़माने यूं याद आ रहे है,
मुंह फेरकर वह जैसे कुछ मुस्कुरा रहे है ।
इक ज़ेर-ए-लब तराना वह गुनगुना रहे है,
आवाज़ [...]
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Posted in बज़्मे उर्दू on June 29, 2007 | No Comments »
यही वादी है वो हमदम जहाँ रेहाना रहती थी,
वो इस वादी कि शहज़ादी थी और शाहाना रहती थी,
कँवल का फूल थी, संसार से बेगाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.
इन्हीं सहराओमें वो अपने गल्ले को चराती थी,
इन्हीं चश्मोमें वो हर रोज मुंह धोने को आती थी,
इन्हीं टिलो के दामन में वो [...]
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अश्क आंखों में कब नहीं आता
लहू आता है जब नहीं आता
होश जाता नहीं रहा लेकिन
जब वो आता है तब नहीं आता
दिल से रुख़सत हूई कोई ख़्वाहिश
गिर्यां कुछ बेसबब नहीं आता
इश्क़ को हौसला है शर्त वरना
बात का किस को ढब नहीं आता
जी में क्या क्या है अपने ऐ हमदम
हर सुखन ता-ब-लब नहीं आता
-‘मीर’ तक़ी मीर
गिर्यां [...]
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Posted in फैज़ अहमद फैज़ on March 11, 2007 | 1 Comment »
मुझे दे दे
रसीले होंट, मासूमाना पेशानी, हसीन आंखे
के मैं एक बार फिर रंगीनीओमें खो जाउं
मेरी हस्ती को तेरी इक नज़र आग़ोशमें ले ले
हमेशा के लिए इस दाममें महफ़ूज़ हो जाउं
ज़िया-ए-हुश्न से ज़ुल्मत-ए-दुनियामें ना फिर आउं
गुज़िस्ता हसरतों के दाग़ मेरे दिल से धूल जाएं
मैं आनेवाले ग़म की फिक्र से आज़ाद हो जाउं
मेरे माज़ी ओ मुस्तक़बिल सरासर [...]
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Posted in परवीन शाकिर on November 15, 2006 | 1 Comment »
टूटी है मेरी नींद, मगर तुमको इससे क्या,
बजते रहे हवाओसे दर, तुमको इससे क्या.
तुम मौज मौज मिस्ले-सबा घूमते रहो,
कट जाये मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या.
औरो का हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ,
मैं भूल जाउं अपना ही घर, तुमको इससे क्या.
अब्रे-गुरेज़-पा को बरसने से क्या गरज़,
सीपीमें बन न पाये गुहर, तुमको इससे क्या.
ले जाये मुझको [...]
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Posted in परवीन शाकिर on October 26, 2006 | 5 Comments »
ઉર્દૂના પ્રખ્યાત કવિયત્રી પરવીન શાકિરનો જન્મ 24 નવેમ્બર, 1952ના રોજ કરાચી ખાતે થયો હતો. તેઓ ઉચ્ચ શિક્ષણ મેળવીને પાકિસ્તાન સિવીલ સર્વિસમાં જોડાયા હતાં. એક ‘પાકિસ્તાની કવિયત્રી’ કહેવડાવવાનું તેઓને ક્યારેય પસંદ નહોતું. 14મી ઑગસ્ટ, 1947ના રોજ ખેંચાયેલી ‘રેડક્લિફ રેખા’ને તેમના કોમળ હૃદયે ક્યારેય સ્વીકારી નહોતી. એટલે જ તેમની કવિતાની ખુશ્બૂ કૃત્રિમ સરહદોની આરપાર હંમેશા મઘમઘતી રહી [...]
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Posted in फैज़ अहमद फैज़ on October 16, 2006 | 4 Comments »
ફૈઝ અહમદ ફૈઝની એક સુંદર રચનાથી શુભારંભ કરીએ, ‘बज़्मे उर्दू’ નો:
दोनो जहां तेरी मोहब्बतमें हार के,
वो जा रहा कोई शबे-ग़म गुज़ार के
वीरान है मयकदा खुम-ओ-साग़र उदास है,
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के
एक फुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन,
देखे है हमने हौसले परवरदिग़ार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,
तुज़ से भी [...]
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