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Archive for the ‘फिराक़ गोरखपुरी’ Category

सागर-ए-सुबह चूकां लाओ, के कुछ रात कटे,
नूर-ए-सय्याल को छलकाओ, के कुछ रात कटे ।
नग़मा-ए-जल्वा-ए-रुख गाओ, के कुछ रात कटे,
शोला-ए-इश्क़ को भडकाओ, के कुछ रात कटे ।
भूले बिसरे हुए ग़म हाए हयात-ए-रफ़्ता,
तुम भी ऐसे में चले आओ, के कुछ रात कटे ।
एक मुद्दत से फज़ाओ में है शोले लपके,
साज़-ए-शबनम ही को खनकाओ, के कुछ रात कटे [...]

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