कुछ रात कटे
Posted in फिराक़ गोरखपुरी on December 12, 2007 | No Comments »
सागर-ए-सुबह चूकां लाओ, के कुछ रात कटे,
नूर-ए-सय्याल को छलकाओ, के कुछ रात कटे ।
नग़मा-ए-जल्वा-ए-रुख गाओ, के कुछ रात कटे,
शोला-ए-इश्क़ को भडकाओ, के कुछ रात कटे ।
भूले बिसरे हुए ग़म हाए हयात-ए-रफ़्ता,
तुम भी ऐसे में चले आओ, के कुछ रात कटे ।
एक मुद्दत से फज़ाओ में है शोले लपके,
साज़-ए-शबनम ही को खनकाओ, के कुछ रात कटे [...]