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Archive for the ‘फैज़ अहमद फैज़’ Category

मुझे दे दे
रसीले होंट, मासूमाना पेशानी, हसीन आंखे
के मैं एक बार फिर रंगीनीओमें खो जाउं
मेरी हस्ती को तेरी इक नज़र आग़ोशमें ले ले
हमेशा के लिए इस दाममें महफ़ूज़ हो जाउं
ज़िया-ए-हुश्न से ज़ुल्मत-ए-दुनियामें ना फिर आउं
गुज़िस्ता हसरतों के दाग़ मेरे दिल से धूल जाएं
मैं आनेवाले ग़म की फिक्र से आज़ाद हो जाउं
मेरे माज़ी ओ मुस्तक़बिल सरासर [...]

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ફૈઝ અહમદ ફૈઝની એક સુંદર રચનાથી શુભારંભ કરીએ, ‘बज़्मे उर्दू’ નો:
दोनो जहां तेरी मोहब्बतमें हार के,
वो जा रहा कोई शबे-ग़म गुज़ार के
वीरान है मयकदा खुम-ओ-साग़र उदास है,
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के
एक फुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन,
देखे है हमने हौसले परवरदिग़ार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,
तुज़ से भी [...]

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