मधुशाला:1-4
Posted in मधुशाला on March 14, 2007 | 1 Comment »
मृदु भावों के अंगूरों की
आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से
आज पिलाऊंगा प्याला;
पहले भोग लगा लूं तुझको
फिर प्रसाद जग पाएगा;
सबसे पहले तेरा स्वागत
करती मेरी मधुशाला । 1 ।
प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर
पूर्ण निकालूंगा हाला,
एक पांव से साक़ी बनकर
नाचूंगा लेकर प्याला;
जीवन की मधुता तो तेरे
ऊपर कब का वार चुका
आज निछावर कर दूंगा मैं
तुझ पर [...]