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गुज़रे हुए ज़माने… November 30, 2007

Posted by Jaydeep in बज़्मे उर्दू.
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મિત્રો,
રાજકોટ આવીને ફરી પાછાં આપની સાથે કદમ મેળવતાં થોડો વિલંબ જરૂર થયો છે, પરંતુ હવે નિયમિતતા આવશે એવી અપેક્ષા છે. કશ્મીર છોડીને મારી હાલત બયાન કરવા માટે પ્રસ્તુત છે ફિરાક ગોરખપુરી સાહેબની એક ગઝલ:

गुज़रे हुए ज़माने यूं याद आ रहे है,
मुंह फेरकर वह जैसे कुछ मुस्कुरा रहे है ।

इक ज़ेर-ए-लब तराना वह गुनगुना रहे है,
आवाज़  खामोशी से गोया मिला रहे है ।

औरों की आशिक़ी को क्या कहिए हम तो अब तक,
शर्माए जा रहे हैं, पछताए जा रहे है ।

तार-ए-सुखन को छू कर हस्सास उंगलीओं से,
इस दौर-ए-ज़ींदगी की हम नब्ज़ पा रहे है ।

तामीर-ए-क़ौमीअत की सब कोशिशे मुसल्लम,
हम बंटे जा रहे हैं या मिटते जा रहे है ।

अपनी सियासतों से यह बाग़बां-ए-आलम,
क्या रंग ला रहे है, क्या गुल खीला रहे है ।

अंधेर कर रहे हैं यह पासबान-ए-मिल्लत,
हम को जगा जगा कर ग़ाफिल बना रहे है ।

दिल से किसी की यादें यूं मिट रही है गोया,
पीछ्ले पहर सितारे कुछ झिलमिला रहे है ।

                                                  — फ़िराक़ गोरखपुरी