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ग़ालिब की सहेली… April 8, 2011

Posted by Jaydeep in बज़्मे उर्दू.
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उर्दु है मेरा नाम, मैं खुसरो की पहेली

मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली ।

 

दकन के वली ने मुझे गोदी में खिलाया

सौदा ने कसीदो ने मेरा हूश्न बढाया

है मीर की अझमत के मुझे चलना सीखाया

मैं दाग़ के आंगन में खिली बनके चमेली ।

 

ग़ालिब ने बुलंदी का सफर मुझको सीखाया

हाली ने मुरव्वत का सबक याद दिलाया

ईकबाल ने आईना-ए-हक मुझको दिखाया

मोमिन ने सजाई मेरे ख्वाबो की हवेली ।

 

है ज़ौक की अझमत के दिए मुझको सहारे

चकबस्त की उल्फत ने मेरे ख्वाब संवारे

फानी ने सजाए मेरे पलकों पे सितारे

अकबर ने रचाई मेरी बेरंग हथेली ।

 

क्यूं मुझको बनाते हो त’आसुब का निशाना

मैंने तो कभी खुद को मुसलमां नहीं माना

देखा था कभी मैंने खुशीयों का ज़माना

अपने ही वतन में हूं मगर आज अकेली ।

 

उर्दु है मेरा नाम, मैं खुसरो की पहेली

मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली ।

 

–ईकबाल अशहर

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Comments»

1. mayuri25 - March 21, 2017

nice post

2. riya - March 21, 2017

execellent post.nice post. i like this उर्दु है मेरा नाम, मैं खुसरो की पहेली

मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली ।

3. riya - March 21, 2017

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मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली ।
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