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ग़ालिब की सहेली… April 8, 2011

Posted by Jaydeep in बज़्मे उर्दू.
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उर्दु है मेरा नाम, मैं खुसरो की पहेली

मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली ।

 

दकन के वली ने मुझे गोदी में खिलाया

सौदा ने कसीदो ने मेरा हूश्न बढाया

है मीर की अझमत के मुझे चलना सीखाया

मैं दाग़ के आंगन में खिली बनके चमेली ।

 

ग़ालिब ने बुलंदी का सफर मुझको सीखाया

हाली ने मुरव्वत का सबक याद दिलाया

ईकबाल ने आईना-ए-हक मुझको दिखाया

मोमिन ने सजाई मेरे ख्वाबो की हवेली ।

 

है ज़ौक की अझमत के दिए मुझको सहारे

चकबस्त की उल्फत ने मेरे ख्वाब संवारे

फानी ने सजाए मेरे पलकों पे सितारे

अकबर ने रचाई मेरी बेरंग हथेली ।

 

क्यूं मुझको बनाते हो त’आसुब का निशाना

मैंने तो कभी खुद को मुसलमां नहीं माना

देखा था कभी मैंने खुशीयों का ज़माना

अपने ही वतन में हूं मगर आज अकेली ।

 

उर्दु है मेरा नाम, मैं खुसरो की पहेली

मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली ।

 

–ईकबाल अशहर

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अहमद फ़राज़ April 4, 2008

Posted by Jaydeep in बज़्मे उर्दू.
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तेरे क़रीब आके बडी उलझनों में हूं
मैं दुश्मनों में हूं कि तेरे दोस्तों में हूं ।

मुझसे गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल
मैं संगे-राह हूं तो सभी रास्तों में हूं ।

तू आ चुका है सतह पे कब से ख़बर नहीं
बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूं ।

ऐ यारे ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं
कब से उदासियों के घने जंगलों में हूं ।

तू लूटकर भी अहले-तमन्ना को ख़ुश नहीं
मैं लुट के भी वफ़ा के उन्हीं क़ाफ़िलों में हूं ।

बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ्तगू
मैं जा चुका हूं हिर भी तेरी महफ़िलों में हूं ।

तू हंस रहा है मुझ पे मेरा हाल देखकर
और फिर भी मैं शरीक तेरे क़हक़हो में हूं ।

ख़ुद ही मिसाले-लाला-ए-सेहरा लहू-लहू
और ख़ुद ‘फ़राज़’ अपने तमाशाएयों में हूं ।

                                                – अहमद फ़राज़

गुरेज़-पा = સંભાળીને ચાલનાર
संगे-राह = રસ્તાનો પથ્થર
यारे ख़ुश-दयार = સારો મિત્ર
मौज़ू-ए-गुफ्तगू = વાતનો વિષય
मिसाले-लाला-ए-सेहरा = જંગલના લાલ ફૂલની જેમ

कुछ रात कटे December 12, 2007

Posted by Jaydeep in फिराक़ गोरखपुरी.
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सागर-ए-सुबह चूकां लाओ, के कुछ रात कटे,
नूर-ए-सय्याल को छलकाओ, के कुछ रात कटे ।

नग़मा-ए-जल्वा-ए-रुख गाओ, के कुछ रात कटे,
शोला-ए-इश्क़ को भडकाओ, के कुछ रात कटे ।

भूले बिसरे हुए ग़म हाए हयात-ए-रफ़्ता,
तुम भी ऐसे में चले आओ, के कुछ रात कटे ।

एक मुद्दत से फज़ाओ में है शोले लपके,
साज़-ए-शबनम ही को खनकाओ, के कुछ रात कटे ।

ओढनी उसकी हवाएं है के तारों भरी रात,
किसी घूंघट ही को सरकाओ, के कुछ रात कटे ।

तुम जुदा होगे तो हो जाएगी यह रात पहाड,
रात की रात ठहर जाओ, के कुछ रात कटे ।

इस ज़माने में कहां है कोई रूदादे-निशात,
ग़म के अफ़साने कहे जाओ, के कुछ रात कटे ।

याद-ए-अय्यम की पूरवाईओ, धीमे धीमे,
मीर की कोई ग़ज़ल गाओ, के कुछ रात कटे ।

आ के महफ़िल में फ़िराक़, आज नहीं नग़मा सारा,
जा के उस को बुला लाओ, के कुछ रात कटे ।

                                                          –फ़िराक़ गोरखपुरी

गुज़रे हुए ज़माने… November 30, 2007

Posted by Jaydeep in बज़्मे उर्दू.
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મિત્રો,
રાજકોટ આવીને ફરી પાછાં આપની સાથે કદમ મેળવતાં થોડો વિલંબ જરૂર થયો છે, પરંતુ હવે નિયમિતતા આવશે એવી અપેક્ષા છે. કશ્મીર છોડીને મારી હાલત બયાન કરવા માટે પ્રસ્તુત છે ફિરાક ગોરખપુરી સાહેબની એક ગઝલ:

गुज़रे हुए ज़माने यूं याद आ रहे है,
मुंह फेरकर वह जैसे कुछ मुस्कुरा रहे है ।

इक ज़ेर-ए-लब तराना वह गुनगुना रहे है,
आवाज़  खामोशी से गोया मिला रहे है ।

औरों की आशिक़ी को क्या कहिए हम तो अब तक,
शर्माए जा रहे हैं, पछताए जा रहे है ।

तार-ए-सुखन को छू कर हस्सास उंगलीओं से,
इस दौर-ए-ज़ींदगी की हम नब्ज़ पा रहे है ।

तामीर-ए-क़ौमीअत की सब कोशिशे मुसल्लम,
हम बंटे जा रहे हैं या मिटते जा रहे है ।

अपनी सियासतों से यह बाग़बां-ए-आलम,
क्या रंग ला रहे है, क्या गुल खीला रहे है ।

अंधेर कर रहे हैं यह पासबान-ए-मिल्लत,
हम को जगा जगा कर ग़ाफिल बना रहे है ।

दिल से किसी की यादें यूं मिट रही है गोया,
पीछ्ले पहर सितारे कुछ झिलमिला रहे है ।

                                                  — फ़िराक़ गोरखपुरी

रेहाना June 29, 2007

Posted by Jaydeep in बज़्मे उर्दू.
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यही वादी है वो हमदम जहाँ रेहाना रहती थी,
वो इस वादी कि शहज़ादी थी और शाहाना रहती थी,
कँवल का फूल थी, संसार से बेगाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

इन्हीं सहराओमें वो अपने गल्ले को चराती थी,
इन्हीं चश्मोमें वो हर रोज मुंह धोने को आती थी,
इन्हीं टिलो के दामन में वो आज़ादाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

खजूरो के तले वो जो खंडहर से झिलमिलाते है,
ये सब रेहाना के मासूम अफ़साने सूनाते है,
वो इन खंडहरो में इक दिन सूरते-अफ़साना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

मेरे हमदम, ये नखलिस्तान एक दिन उसका मस्किन था,
इसी के खुर्मी-ए-आगोशमें उसका नशेमन था,
इसी शादाब वादी में वो बे-बाकाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

इसी वीराने में इक दिन बहिश्ते लहलहाती थी,
घटाएँ घिर के आती थी, हवाएँ मुस्कुराती थी,
के वो बनकर बहारे-जन्नते-वीराना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

यही आबाद थी इक दिन मेरे इफ़कार की मलिका,
मेरे जज़बात की देवी, मेरे आशार की मलिका,
वो मलिका जो बारंगे-अज़मते-शाहाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

सबा शाखोंमे नखलिस्तान की जीस दम सरसराती है,
मुझे हर लहर से रेहाना की आवाज़ आती है,
यहीं रेहाना रहती थी, यहीं रेहाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

फज़ाएं गुंजती है, अब भी यूं वहशी तरानो से,
सूनो, आवाज़ सी आती है उन खाकी चट्टानो से,
कि जीनमें वो बारंगे-नग़मे-बेग़ाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

शमीमे-ज़ुल्फ से उसकी महक जाती थी कुल वादी,
निगाहे-मस्त से उसकी बहक जाती थी कुल वादी,
हवामें परफिशाँ रुहे-मय-ओ-मैखाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

गुदाज़े-इश्क़ से लबरेज़ था क़्ल्बे-हसीन उसका,
मगर आईना दरे-शर्म था, रु-ए-हसीं उसका,
खामोशी ने छिपाए नग़मा-ए-मस्ताना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

उसे फूलोनें मेरी यादमें बेताब देखा है,
सितारों की नज़रने रातभर बे-ख्वाब देखा है,
वो शमा-ए-हुश्न थी पर सूरते-परवाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

पयामे-दर्दे-दिल ‘अख्तर’ दिये जाते हूँ वादी को,
सलामे-रुखसते-ग़मग़ीन किये जाता हूँ वादी को,
सलाम, ऎ वादी-ए-वीरान, जहाँ रेहाना रहती थी,
यही वादी है वो हमदम, जहाँ रेहाना रहती थी.

                                                      -अख्तर शिरानी

‘मीर’ तक़ी मीर March 30, 2007

Posted by Jaydeep in 'मीर' तक़ी मीर, बज़्मे उर्दू.
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अश्क  आंखों में  कब  नहीं  आता

लहू   आता  है  जब  नहीं  आता

होश   जाता   नहीं   रहा  लेकिन

जब  वो  आता  है तब नहीं आता

दिल  से रुख़सत हूई कोई ख़्वाहिश

गिर्यां  कुछ  बेसबब   नहीं  आता

इश्क़  को  हौसला  है  शर्त वरना

बात का किस को ढब  नहीं  आता

जी में क्या क्या है अपने ऐ हमदम

हर  सुखन  ता-ब-लब नहीं  आता 

                                      मीर तक़ी मीर

  गिर्यां : રુદન, सुखन : વાત,  ता-ब-लब : હોંઠ સુધી

हसीना-ए-खयाल से March 11, 2007

Posted by Jaydeep in फैज़ अहमद फैज़.
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मुझे दे दे
रसीले होंट, मासूमाना पेशानी, हसीन आंखे
के मैं एक बार फिर रंगीनीओमें खो जाउं
मेरी हस्ती को तेरी इक नज़र आग़ोशमें ले ले
हमेशा के लिए इस दाममें महफ़ूज़ हो जाउं
ज़िया-ए-हुश्न से ज़ुल्मत-ए-दुनियामें ना फिर आउं
गुज़िस्ता हसरतों के दाग़ मेरे दिल से धूल जाएं
मैं आनेवाले ग़म की फिक्र से आज़ाद हो जाउं
मेरे माज़ी ओ मुस्तक़बिल सरासर मह्व हो जाएं
मुज़े वो एक नज़र, एक जावेदानी सी नज़र दे दे

                                            -फैज़ अहमद फैज़
                              

                                      * * * *

पेशानी: લલાટ,महफ़ूज़:સુરક્ષિત, गुज़िस्ता: વીતેલા,

माज़ी: ભૂતકાળ, मुस्तक़बिल: ભવિષ્ય,
मह्व: વિસ્મૃત, जावेदानी: શાશ્વત

तुमको इससे क्या… November 15, 2006

Posted by Jaydeep in परवीन शाकिर.
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टूटी है मेरी नींद, मगर तुमको इससे क्या,
बजते रहे हवाओसे दर, तुमको इससे क्या.

तुम मौज मौज मिस्ले-सबा घूमते रहो,
कट जाये मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या.

औरो का हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ,
मैं भूल जाउं अपना ही घर, तुमको इससे क्या.

अब्रे-गुरेज़-पा को बरसने से क्या गरज़,
सीपीमें बन न पाये गुहर, तुमको इससे क्या.

ले जाये मुझको माले-ग़नीमत के साथ उदू,
तुमने तो डाल दी है सिपर, तुमको इससे क्या.

तुमने तो थक के दश्तमें खेमे लगा लिए,
तन्हां कटे किसीका सफर, तुमको इससे क्या.
-परवीन शाकिर
*********************

मिस्ले-सबा: હવાની લહેરખીઓ
अब्रे-गुरेज़-पा:વરસાદી વાદળાઓ
सीपी:છીપ
गुहर:મોતી
उदू: હરીફ, દુશ્મન
सिपर: ઢાલ

પરવીન શાકિર October 26, 2006

Posted by Jaydeep in परवीन शाकिर.
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ઉર્દૂના પ્રખ્યાત કવિયત્રી પરવીન શાકિરનો જન્મ 24 નવેમ્બર, 1952ના રોજ કરાચી ખાતે થયો હતો. તેઓ ઉચ્ચ શિક્ષણ મેળવીને પાકિસ્તાન સિવીલ સર્વિસમાં જોડાયા હતાં. એક ‘પાકિસ્તાની કવિયત્રી’ કહેવડાવવાનું તેઓને ક્યારેય પસંદ નહોતું. 14મી ઑગસ્ટ, 1947ના રોજ ખેંચાયેલી ‘રેડક્લિફ રેખા’ને તેમના કોમળ હૃદયે ક્યારેય સ્વીકારી નહોતી. એટલે જ તેમની કવિતાની ખુશ્બૂ કૃત્રિમ સરહદોની આરપાર હંમેશા મઘમઘતી રહી છે. પરવીન શાકિરની કવિતામાં નિકટતા અને ઉપેક્ષા વચ્ચેનો સંઘર્ષ જોવા મળે છે.

શીતળ સમીરની લહેરખી ફૂલને ચૂમે છે અને ખુશ્બૂનો જન્મ થાય છે. એ જ રીતે, 1976માં 116 કાવ્યો સાથે પરવીન શાકિરનો પ્રથમ સંગ્રહ ‘ખુશ્બૂ’ પ્રકાશિત થયો. એને ‘આદમજી ઍવોર્ડ’ પ્રાપ્ત થયો. ત્યાર બાદ, ક્રમશ: ‘સદ-બર્ગ’, ‘ઈન્કાર’ અને ‘માહ-એ-તમામ’ પ્રકાશિત થયા. રૂઢિચુસ્ત સમાજ ક્યારેય કલાની મુક્ત અભિવ્યક્તિને સ્વીકારતો નથી. પરવીન શાકિર અને તેમની શાયરી પણ ટીકાકારોથી બચી શક્યા નહીં; પરંતુ, પરવીને ક્યારેય નમતુ ન જોખ્યું.

પરવીન પોતાના જન્મને એક ‘કુદરતી અકસ્માત’ માનતા હતા અને વિધીની વિચિત્રતા જુઓ, ઈસ્લામાબાદમાં 26 ડિસેમ્બર, 1994ના રોજ એક જીવલેણ કાર અકસ્માતમાં જ ઉર્દૂ સાહિત્યજગતનો આ ઝળહળતો સિતારો આથમી ગયો.

‘પ્રેમ જ્યારે દૈહિક જરૂરિયાતોને અતિક્રમી જાય છે ત્યારે દીવ્ય સ્વરૂપ ધારણ કરે છે, અને સુંદરતા જ્યારે એની ચરમસીમાએ પહોંચે છે ત્યારે ‘ખુશ્બૂ’ બને છે…’

कुछ तो हवा भी सर्द थी, कुछ था तेरा खयाल भी
दिल को खुशी के साथ साथ, होता रहा मलाल भी

बात वो आधी रात की, रात वो पूरे चांद की
चांद भी ऐन चेत का, उस पे तेरा जमाल भी

सब से नज़र बचाके वो मुझको ऐसे देखते
एक दफा तो रुक गई, गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी

दिल तो चमक सकेगा क्या, फिर भी तराश के देख लो
शिशागरां-ए-शहर के हाथ का यह कमाल भी

मेरी तलब था एक शख़्स, वो जो नही मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूं गिरा, भूल गया सवाल भी

शाम की नासमझ हवा पूछ रही है इक पता
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मेरा खयाल भी

उसके ही बाज़ूओमें और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशो पे थे रूह के और जाल भी

-परवीन शाकिर

सर्द: નિષ્પ્રાણ, ઠંડી
मलाल: દુ:ખ, દર્દ
चेत:ચૈત્ર માસ
जमाल: સૌન્દર્ય, સુંદરતા
गर्दिश-ए-माह-ओ-साल: વર્ષની વિવિધ ઋતુઓ
शिशांगरा: કાચકામનો કારીગર
मुहाल: મુશ્કેલ, અશક્ય
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार: દોસ્તની ગલીમાંથી નીકળતી હવાની લહેરખી

दोनो जहां हार के… October 16, 2006

Posted by Jaydeep in फैज़ अहमद फैज़.
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ફૈઝ અહમદ ફૈઝની એક સુંદર રચનાથી શુભારંભ કરીએ, ‘बज़्मे उर्दू’ નો:

दोनो जहां तेरी मोहब्बतमें हार के,
वो जा रहा कोई शबे-ग़म गुज़ार के

वीरान है मयकदा खुम-ओ-साग़र उदास है,
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के

एक फुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन,
देखे है हमने हौसले परवरदिग़ार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,
तुज़ से भी दिलफरेब है ग़म रोज़गार के

भूले से मुस्कुरा तो लिए थे वो आज, ‘फैज़’,
मत पूछ वलवले दिल-ए-नाकारदाकार के

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शबे-ग़म: દર્દભરી રાત
खुम-ओ-साग़र: પ્યાલાઓ અને કૂંજાઓ
दिलफरेब: લોભામણી, લલચાવનાર, હૃદયને છેતરનાર
ग़मे-रोज़गार: જીવનની રોજબરોજની સમસ્યાઓ
वलवले: ઉછળતી ઉત્કટ લાગણીઓ
दिल-ए-नाकारदाकार: કમનસીબ, દુર્દૈવી હૃદય

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