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हसीना-ए-खयाल से March 11, 2007

Posted by Jaydeep in फैज़ अहमद फैज़.
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मुझे दे दे
रसीले होंट, मासूमाना पेशानी, हसीन आंखे
के मैं एक बार फिर रंगीनीओमें खो जाउं
मेरी हस्ती को तेरी इक नज़र आग़ोशमें ले ले
हमेशा के लिए इस दाममें महफ़ूज़ हो जाउं
ज़िया-ए-हुश्न से ज़ुल्मत-ए-दुनियामें ना फिर आउं
गुज़िस्ता हसरतों के दाग़ मेरे दिल से धूल जाएं
मैं आनेवाले ग़म की फिक्र से आज़ाद हो जाउं
मेरे माज़ी ओ मुस्तक़बिल सरासर मह्व हो जाएं
मुज़े वो एक नज़र, एक जावेदानी सी नज़र दे दे

                                            -फैज़ अहमद फैज़
                              

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पेशानी: લલાટ,महफ़ूज़:સુરક્ષિત, गुज़िस्ता: વીતેલા,

माज़ी: ભૂતકાળ, मुस्तक़बिल: ભવિષ્ય,
मह्व: વિસ્મૃત, जावेदानी: શાશ્વત

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दोनो जहां हार के… October 16, 2006

Posted by Jaydeep in फैज़ अहमद फैज़.
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ફૈઝ અહમદ ફૈઝની એક સુંદર રચનાથી શુભારંભ કરીએ, ‘बज़्मे उर्दू’ નો:

दोनो जहां तेरी मोहब्बतमें हार के,
वो जा रहा कोई शबे-ग़म गुज़ार के

वीरान है मयकदा खुम-ओ-साग़र उदास है,
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के

एक फुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन,
देखे है हमने हौसले परवरदिग़ार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,
तुज़ से भी दिलफरेब है ग़म रोज़गार के

भूले से मुस्कुरा तो लिए थे वो आज, ‘फैज़’,
मत पूछ वलवले दिल-ए-नाकारदाकार के

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शबे-ग़म: દર્દભરી રાત
खुम-ओ-साग़र: પ્યાલાઓ અને કૂંજાઓ
दिलफरेब: લોભામણી, લલચાવનાર, હૃદયને છેતરનાર
ग़मे-रोज़गार: જીવનની રોજબરોજની સમસ્યાઓ
वलवले: ઉછળતી ઉત્કટ લાગણીઓ
दिल-ए-नाकारदाकार: કમનસીબ, દુર્દૈવી હૃદય

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