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चंद अशआर February 19, 2008

Posted by Jaydeep in પ્રકીર્ણ.
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ये कह दो हज़रते-नासेह से गर समझाने आये है,
कि हम दैर-ओ-हरम होते हुए मयख़ाने आये है ।
– वहशत गौंडवी

निकल कर दैर-ओ-काबा से अगर मिलता न मयख़ाना,
तो ठुकराये हुए इन्सां, ख़ुदा जाने कहां जाते ।
– क़तील शिफ़ाई

हुदूदे-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा,
न कोई ग़ैर, न कोई रक़ीब लगता है ।
( हुदूदे-ज़ात=વ્યક્તિગત સીમાઓ )

तोड डाली मैंने जब क़ैदे-तअय्युन की हदें,
मेरी नज़रों में बराबर कुफ़्रो-ईमां हो गया ।
( क़ैदे-तअय्युन= હઠનું બંધન )

जिस पे बुतख़ाना तसद्दुक़, जिस पे काबा भी निसार,
एक सूरत ऐसी भी सुनते है बुतख़ाने में है ।
( तसद्दुक़= ન્યોછાવર )

ख़ुलूसे-दिल से सिज्दे हों तो उन सिज्दों का क्या कहना,
वहीं काबा सरक आया, जबीं रख दी जहां मैने ।

                               ***
चोट पे चोट खाये जा, दिल की तरफ़ कभी न देख
इश्क़ पे ऐतमाद रख, हुस्न की बेरुख़ी न देख,
इश्क़ का नूर नूर है, हुस्न की चाँदनी न देख
तू तो खुद आफ़ताब है, ज़र्रे में रोशनी न देख,
इश्क़ की मंज़िलों से दूर, राहे-नियाज़ कर उबूर
फ़ितरते-बन्दगी समझ, क़ीमते-बन्दगी न देख ।

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